सीमाओं की बहन: लद्दाख की बर्फीली चोटियों से लेकर देश की सरहदों तक, 17 वर्षों से सैनिकों का संबल बनीं कर्नल (मानद) पार्वती जांगिड़ सुथार
विशेष रिपोर्ट | जोधपुर/लेह/द्रास
18 हजार फीट से अधिक ऊँची बर्फीली चोटियाँ, ऑक्सीजन की कमी, माइनस तापमान, दुर्गम पहाड़ी रास्ते और दुश्मन की निगाहों के बीच चौबीसों घंटे डटे भारतीय जवान। ऐसी विषम परिस्थितियों में जहाँ आम नागरिक का पहुँचना भी मुश्किल माना जाता है, वहाँ एक महिला ने 21 दिनों में 3,100 किलोमीटर की सीमांत यात्रा कर 3,750 सैनिकों की कलाई पर रक्षासूत्र बाँधकर देशभर का स्नेह पहुँचाया।
यह कहानी है कर्नल (मानद) पार्वती जांगिड़ सुथार की, जिन्हें देशभर में “सिस्टर ऑफ सोल्जर्स” के नाम से जाना जाता है। पिछले दिनों संपन्न हुई“सुरक्षित सीमा-समर्थ भारत 35वीं भारत रक्षा पर्व यात्रा” के साथ उन्होंने एक बार फिर यह साबित किया कि सैनिकों का मनोबल केवल हथियारों से नहीं, बल्कि राष्ट्र की संवेदनाओं से भी मजबूत होता है।
नई दिल्ली से शुरू हुई यह यात्रा लद्दाख, कारगिल, सियाचिन, तुरतुक, द्रास और रेज़ांग ला जैसे सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण क्षेत्रों से गुजरते हुए कारगिल वॉर मेमोरियल पर संपन्न हुई। यात्रा के दौरान 71 सैन्य यूनिटों को प्रशस्ति-पत्र, 99 वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों को “राष्ट्रीय योद्धा सेवा सम्मान” और 721 जवानों को “अमृतस्य पुत्रा सम्मान” प्रदान किए गए।
लेकिन यह उपलब्धि केवल एक यात्रा की नहीं है। इसके पीछे लगभग दो दशकों की वह तपस्या है जिसने राजस्थान के एक सीमांत गाँव की बेटी को देश के लाखों सैनिकों की बहन बना दिया।
बाड़मेर की मिट्टी में जन्मी, संघर्षों में तपकर बनीं राष्ट्रसेविका
राजस्थान के बाड़मेर जिले के भारत-पाक सीमा क्षेत्र स्थित गगरिया गाँव में जन्मीं पार्वती जांगिड़ सुथार का जीवन संघर्षों से शुरू हुआ। विभिन्न प्रकाशित जीवनवृत्तों के अनुसार कम उम्र में पिता स्वर्गीय लूणाराम सुथार के निधन के बाद उन्हें सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। सीमांत ग्रामीण परिवेश में रहते हुए उन्होंने बाल विवाह जैसी सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध संघर्ष किया और शिक्षा एवं आत्मनिर्भरता का मार्ग चुना। इन्हीं अनुभवों ने उनके भीतर समाजसेवा और राष्ट्रसेवा का बीज बोया।
एक राखी से शुरू हुआ राष्ट्रव्यापी अभियान
करीब 17 वर्ष पहले शुरू हुई एक छोटी-सी पहल आज एक अनूठा राष्ट्रीय अभियान बन चुकी है।
रक्षाबंधन के अवसर पर सैनिकों को राखी बाँधने का विचार लेकर पार्वती जांगिड़ सुथार पहली बार सीमा चौकियों तक पहुँचीं। जवानों के बीच बहन का स्नेह और अपनत्व इतना प्रभावी सिद्ध हुआ कि यह अभियान हर वर्ष विस्तृत होता गया।
आज स्थिति यह है कि भारतीय सेना, बीएसएफ, आईटीबीपी, असम राइफल्स, कोस्ट गार्ड सहित विभिन्न सुरक्षा बलों के जवान उन्हें स्नेहपूर्वक “सिस्टर ऑफ सोल्जर्स”, “सिस्टर ऑफ बीएसएफ”, “सिस्टर ऑफ हिमवीर” और “सिस्टर ऑफ आईसीजी” जैसे संबोधनों से पुकारते हैं।
लाखों सैनिकों तक पहुँची बहन की राखी
ताज़ा उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार पार्वती जांगिड़ सुथार अब तक 2 लाख किलोमीटर से अधिक सीमांत क्षेत्रों का प्रवास कर चुकी हैं।
उन्होंने 7,500 से अधिक सीमा चौकियों और सैन्य प्रतिष्ठानों तक पहुँचकर 5.60 लाख से अधिक सैनिकों को स्वयं के हाथों से तैयार किए गए रक्षासूत्र बाँधे हैं। इसके साथ ही वे सैनिकों और उनके परिवारों की अनेक समस्याओं के समाधान के लिए भी सक्रिय रूप से प्रयास करती रही हैं।
उनकी इसी भूमिका ने उन्हें सैनिक समुदाय में एक विशिष्ट पहचान दिलाई है।
रेज़ांग ला में छलक पड़े गर्व और भावनाओं के आँसू
35वीं भारत रक्षा पर्व यात्रा का सबसे भावुक पड़ाव था 16,420 फीट ऊँचाई पर स्थित रेज़ांग ला युद्ध स्मारक।
यही वह रणभूमि है जहाँ 18 नवम्बर 1962 को 13 कुमाऊँ की चार्ली कंपनी ने मेजर शैतान सिंह के नेतृत्व में चीनी सेना के विरुद्ध अद्वितीय वीरता का परिचय दिया था।
जोधपुर क्षेत्र से जुड़ी पार्वती जांगिड़ सुथार जब इस ऐतिहासिक रणभूमि पर पहुँचीं तो उनके लिए यह केवल एक स्मारक नहीं, बल्कि अपने ही क्षेत्र के अमर वीरों की तपोभूमि थी। उन्होंने 120 बलिदानी वीरों को श्रद्धांजलि अर्पित की और रेज़ांग ला की मिट्टी को नमन किया।
सियाचिन से जीरो आरडी तक पहुँची ‘सिस्टर ऑफ सोल्जर्स’
लद्दाख अभियान के दौरान उन्होंने विश्व के सबसे ऊँचे युद्धक्षेत्र सियाचिन बेस कैंप में तैनात जवानों से मुलाकात की। वहाँ सैनिकों के साथ रक्षाबंधन मनाया और ओपी बाबा मंदिर में सैनिकों की सुरक्षा के लिए प्रार्थना की।
यात्रा का एक अन्य महत्वपूर्ण पड़ाव था तुरतुक और जीरो आरडी पोस्ट, जिसे गिलगित-बाल्टिस्तान क्षेत्र के प्रवेश द्वार के रूप में जाना जाता है। यहाँ अग्रिम सीमा चौकियों पर तैनात जवानों को रक्षासूत्र बाँधकर उन्होंने देशवासियों का संदेश पहुँचाया।
कारगिल और द्रास के युद्ध स्मारकों पर पहुँचकर 1999 के शहीदों को श्रद्धांजलि देना भी इस अभियान का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा।
सैनिक सेवा के साथ लोकतांत्रिक जागरूकता का अभियान
सैनिकों के बीच लोकप्रिय पहचान से इतर पार्वती जांगिड़ सुथार “युवा संसद, भारत” की चेयरपर्सन के रूप में भी कार्य कर रही हैं। विभिन्न प्रकाशित स्रोतों के अनुसार उनका उद्देश्य युवाओं को लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं, सामाजिक उत्तरदायित्व और राष्ट्रनिर्माण से जोड़ना है।
उनका मानना है कि सशक्त युवा, सशक्त समाज और सुरक्षित सीमाएँ मिलकर एक विकसित भारत का निर्माण करती हैं।
महिला सशक्तिकरण की मजबूत आवाज
अपनी सैनिक सेवा यात्रा के समानांतर पार्वती जांगिड़ सुथार महिलाओं के अधिकार, शिक्षा और सामाजिक सुधार के मुद्दों पर भी सक्रिय रही हैं। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं और बालिकाओं के सशक्तिकरण के लिए कार्य किया है तथा सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध जागरूकता अभियान चलाए हैं।
राष्ट्रीय सीमाओं से अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहचान
उनकी सेवाओं को राष्ट्रीय ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सम्मान मिला है।
भारत के विभिन्न सुरक्षा बलों द्वारा सम्मानित किए जाने के अलावा उन्हें मोल्दोवा के सीजीआईएम मिलिट्री सेंटर द्वारा मानद कर्नल की उपाधि प्रदान की गई।
वर्ष 2025 में उन्हें हार्वर्ड100 द्वारा दुनिया की सबसे असाधारण महिलाओं की सूची में भी स्थान दिया गया। प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार यह सम्मान सामाजिक परिवर्तन, महिला सशक्तिकरण और सैनिक कल्याण के क्षेत्र में उनके योगदान की मान्यता के रूप में दिया गया।
एक अभियान नहीं, एक जीवन-दर्शन
आज जब देश सुरक्षा, राष्ट्रवाद और सैनिक सम्मान की बात करता है, तब पार्वती जांगिड़ सुथार का कार्य एक अलग उदाहरण प्रस्तुत करता है।
उन्होंने यह सिद्ध किया है कि सीमा पर खड़े सैनिक और देश के नागरिकों के बीच भावनात्मक रिश्ता भी राष्ट्रीय शक्ति का महत्वपूर्ण आधार है। हजारों किलोमीटर की यात्राएँ, लाखों सैनिकों से आत्मीय संवाद, सीमाओं तक पहुँचकर राखी बाँधना और सैनिक परिवारों के साथ खड़े रहना उनके जीवन का मिशन बन चुका है।
लद्दाख की 18 हजार फीट ऊँची चोटियों पर संपन्न हुई 35वीं भारत रक्षा पर्व यात्रा दरअसल उसी अनवरत यात्रा का नवीन अध्याय है, जो वर्षों पहले बाड़मेर के एक सीमांत गाँव से शुरू हुई थी और आज पूरे देश की सरहदों तक पहुँच चुकी है।
और शायद यही कारण है कि सैनिक उन्हें किसी पद, सम्मान या संगठन के नाम से नहीं, बल्कि एक रिश्ते से याद करते हैं।
देश की सीमाओं पर तैनात लाखों जवानों के लिए वह सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि “सिस्टर ऑफ सोल्जर्स” हैं।
“राष्ट्रभक्ति, सेवा, त्याग और समर्पण की जीवंत प्रतिमूर्ति ऐसी महान एवं गौरवशाली नारी शक्ति को पत्रिका टुडे परिवार का कोटि-कोटि नमन और बिग सैल्यूट।”